एक बजे
रात के एक बजे रामू की टपरी का स्पीकर बोल पड़ा: “हरिया से दस रुपये प्राप्त हुए।”
रामू खाट पर उठ बैठा। गोरखपुर स्टेशन के बाहर यह उसकी चाय की टपरी थी। रात को वह शटर गिराकर पीछे ही खाट डालकर सो जाता था। गल्ले के ऊपर रखा छोटा स्पीकर तब बोलता है, जब किसी का पेमेंट आता है।
उसने फ़ोन देखा। कोई पेमेंट नहीं आया था। खाते में एक पैसा नहीं बढ़ा था। शटर बंद था और गली सुनसान। मशीन ख़राब होगी, उसने सोचा और करवट बदल ली।
हरिया रिक्शेवाला रोज़ सुबह छह बजे पहली चाय पीने आता था, दस रुपये की। उस सुबह भी आया। रामू ने हँसकर कहा, “आज पैसे मत दे। रात को ही दे गया था, मेरा स्पीकर बोला।”
हरिया ठहाका मारकर हँसा। “रात को तो मैं रिक्शा खड़ा करके सोया था, भाई। मेरे पास कहाँ दस रुपये।” फिर भी उसने दस का नोट गल्ले में रखा, चाय पी, गमछा कंधे पर डाला और चला गया।
शाम को स्टेशन के बाहर भीड़ लगी थी। हरिया अपने रिक्शे की सीट पर बैठा था, सिर एक तरफ़ झुका हुआ। सवारी का इंतज़ार करते-करते ही उसकी साँस रुक गई थी।
रामू ने सोचा, इत्तेफ़ाक़ है। उस रात वह जागता रहा। एक बजे स्पीकर फिर बोला।