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दस रुपये

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Horror

दस रुपये

रात के एक बजे बंद टपरी का स्पीकर बोलता है: ‘दस रुपये प्राप्त हुए।’ अगली शाम वह आदमी नहीं रहता।

13+ 5 min read हिन्दी 4 chapters AI-assisted fiction

गोरखपुर स्टेशन के बाहर रामू की चाय की टपरी रात को बंद रहती है, फिर भी एक बजे उसका स्पीकर किसी का नाम लेकर दस रुपये मिलने की बात बोल देता है। खाते में एक पैसा नहीं आता। पर जिसका नाम लिया जाता है, वह सुबह की चाय पीता है और शाम तक नहीं रहता। तीसरी रात स्पीकर रामू के सबसे पुराने ग्राहक का नाम लेता है। रामू के पास एक रात है, और एक ही सवाल: जो पैसा ले लिया गया है, क्या वह लौटाया जा सकता है?

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एक बजे

रात के एक बजे रामू की टपरी का स्पीकर बोल पड़ा: “हरिया से दस रुपये प्राप्त हुए।”

रामू खाट पर उठ बैठा। गोरखपुर स्टेशन के बाहर यह उसकी चाय की टपरी थी। रात को वह शटर गिराकर पीछे ही खाट डालकर सो जाता था। गल्ले के ऊपर रखा छोटा स्पीकर तब बोलता है, जब किसी का पेमेंट आता है।

उसने फ़ोन देखा। कोई पेमेंट नहीं आया था। खाते में एक पैसा नहीं बढ़ा था। शटर बंद था और गली सुनसान। मशीन ख़राब होगी, उसने सोचा और करवट बदल ली।

हरिया रिक्शेवाला रोज़ सुबह छह बजे पहली चाय पीने आता था, दस रुपये की। उस सुबह भी आया। रामू ने हँसकर कहा, “आज पैसे मत दे। रात को ही दे गया था, मेरा स्पीकर बोला।”

हरिया ठहाका मारकर हँसा। “रात को तो मैं रिक्शा खड़ा करके सोया था, भाई। मेरे पास कहाँ दस रुपये।” फिर भी उसने दस का नोट गल्ले में रखा, चाय पी, गमछा कंधे पर डाला और चला गया।

शाम को स्टेशन के बाहर भीड़ लगी थी। हरिया अपने रिक्शे की सीट पर बैठा था, सिर एक तरफ़ झुका हुआ। सवारी का इंतज़ार करते-करते ही उसकी साँस रुक गई थी।

रामू ने सोचा, इत्तेफ़ाक़ है। उस रात वह जागता रहा। एक बजे स्पीकर फिर बोला।

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Chapters

  1. 1एक बजे
  2. 2दूसरा नाम, तीसरा नाम
  3. 3वापस
  4. 4वही नोट