पीपल के नीचे
रामदीन मोची के हाथ में जब कोई जूता आता है, तो उसे वह रास्ता दिख जाता है जिस पर वह जूता कल चलेगा।
बस कुछ पल के लिए, जैसे नब्ज़ पर उँगली रखी हो। आज दफ़्तर, कल मंदिर, परसों सब्ज़ी मंडी। तीस साल से यही चल रहा था, और यह बात उसने किसी को नहीं बताई।
उसका एक ही नियम था: जो दिखे, चुपचाप सी दो। रास्ता तुम्हारा नहीं है।
भोपाल के बुधवारा चौराहे पर पीपल के नीचे उसकी चटाई बिछती थी। चटाई पर कील, धागा, रबर के टुकड़े और एक पुराना काला डिब्बा।
उस शाम सात बजे एक औरत आई, पसीने से भीगी हुई। हाथ में बच्चे के स्कूल के जूते थे। “भैया, तला उखड़ गया है। कल सुबह तक हो जाएँगे?”
“हो जाएँगे, बहन जी।”
“सुबह सात बजे आकर ले जाऊँगी। बेटा नौवीं में है, साढ़े आठ बजे स्कूल लगता है।”
रामदीन ने जूते हाथ में लिए। काले, घिसे हुए, सात नंबर के। और रास्ता दिख गया।
एक गली। चाय की दुकान वाला मोड़। पीली दीवार का मकान। फिर रेल का फाटक। फाटक के पास एक दुकान की घड़ी, और उस पर आठ बजकर दस मिनट।
फिर दो पटरियाँ। उनके बीच की दरार में फँसी हुई एक एड़ी। और दूर से आती इंजन की सीटी।
बस। उसके आगे कोई रास्ता नहीं था, जैसे किसी ने धागा काट दिया हो।
रामदीन का हाथ काँप गया। बाईस साल पहले उसने एक बार ऐसा कटा हुआ रास्ता देखा था। उसने तब भी कुछ नहीं कहा था, और उस आदमी का जूता फिर कभी मरम्मत के लिए नहीं आया।
“क्या हुआ भैया?” औरत ने पूछा। उसकी आँखों में सिर्फ़ थकान थी।
“कुछ नहीं,” रामदीन ने कहा। गला सूख रहा था। “सुबह तक मिल जाएँगे।”
औरत चली गई। रामदीन जूतों को देखता रहा। कल सुबह आठ बजकर दस मिनट पर ये जूते फाटक पर पहुँचने वाले थे।