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नामंज़ूर

13+
Horror

नामंज़ूर

रिटायरमेंट से दो दिन पहले क्लर्क के काउंटर पर एक आवेदन आता है: उसी की मृत्यु का।

13+ 5 min read हिन्दी 4 chapters AI-assisted fiction

महेश तिवारी तहसील दफ़्तर में तीस साल से ठप्पे लगा रहा है। रिटायर होने में दो दिन बचे हैं, जब शाम को बोर्ड एक ऐसे टोकन को पुकारता है जो कभी छपा ही नहीं। झिर्री से एक काग़ज़ सरककर आता है, और उस पर महेश का अपना नाम है। हरा ठप्पा लगाना आसान है। चौकीदार भैरों को पता है कि इसके बाद क्या होता है, और यह भी कि महेश के बाद इस कुर्सी पर कौन बैठेगा।

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इकतालीसवाँ टोकन

रिटायर होने में दो दिन बचे थे, और महेश तिवारी पहली बार शाम पाँच बजे के बाद भी दफ़्तर में बैठा था।

एक किसान की ज़मीन की फ़ाइल अधूरी पड़ी थी। तीस साल की नौकरी का आख़िरी काम वह अधूरा छोड़कर नहीं जाना चाहता था।

जबलपुर के इस तहसील दफ़्तर में पाँच बजते ही सब भाग लेते थे। भैरों चौकीदार बत्तियाँ बुझा देता और शटर गिरा देता। आज महेश के कहने पर उसने बस हॉल की आधी बत्तियाँ बंद की थीं।

साढ़े पाँच बजे दीवार पर लगा लाल बोर्ड बीप से बोला: “टोकन 41, काउंटर 3।”

महेश का हाथ रुक गया। कोने की मशीन से दिन में लोग पर्ची निकालते थे, और रोज़ चालीस टोकन छपते थे। इकतालीसवाँ कभी नहीं छपा। हॉल की बेंचें ख़ाली थीं। और काउंटर 3 उसी का काउंटर था।

भैरों हड़बड़ाकर अंदर आया। उसके हाथ में अब भी शटर की चाबी थी। “साहब, बोर्ड की तरफ़ मत देखिए।”

“भैरों, ये इकतालीस नंबर कौन...”

“आपसे पहले वर्मा जी इस कुर्सी पर बैठते थे, बाईस साल। एक शाम उन्होंने बिना पढ़े ठप्पा लगा दिया। सुबह वे इसी कुर्सी पर मिले।”

महेश ने धीरे से पूछा, “कौन-सा काग़ज़?”

भैरों ने नज़र फेर ली। “जो अभी आएगा। पढ़कर ही कुछ कीजिएगा, साहब। मैं बाहर बैठा हूँ। मुझे भी नहीं देखना।”

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Chapters

  1. 1इकतालीसवाँ टोकन
  2. 2दो ठप्पे
  3. 3कुर्सी का काग़ज़
  4. 4आख़िरी कुर्सी