निकासी
इकहत्तर साल के बनवारी लाल सक्सेना को हिसाब में आज तक धोखा नहीं हुआ। तीस साल उन्होंने झाँसी के एक स्कूल में क्लर्की की, और आज भी पेंशन का एक-एक रुपया अपनी कॉपी में लिखते हैं।
पहली तारीख़ को वे स्टेशन रोड वाली बैंक शाखा में पासबुक छपवाने गए। मशीन खटर-खटर करती रही, फिर रुक गई। बनवारी जी ने काग़ज़ उठाया और आख़िरी लाइन पर उनकी नज़र अटक गई।
“निकासी – 365 दिन। रात 2:07 बजे। एटीएम।”
उसके नीचे छपा था, “शेष – 8,760 दिन।” और सबसे ऊपर खाते का नाम: आयु बचत खाता।
रुपये की जगह दिन। बनवारी जी ने पासबुक मैनेजर को दिखाई। मैनेजर ने पढ़ा और मुस्कुरा दिया। “सर, प्रिंटर की गड़बड़ी है। आपके रुपये सलामत हैं।”
बनवारी जी मुस्कुरा नहीं पाए। उनका एटीएम कार्ड कल रात अलमारी में बंद था। और वे जानते थे कि 8,760 दिन पूरे चौबीस साल होते हैं।
घर आकर उन्होंने कॉपी में लिखा: 71 + 24 = 95। फिर उसे काट दिया। उन्हें ख़ुद नहीं पता था कि क्यों।
उस रात वे कार्ड को तकिये के नीचे रखकर सोए, और दरवाज़े की कुंडी दो बार जाँची।